Wednesday, June 29, 2011

कविता – प्रेमचंद सहजवाला

कभी भी कर नहीं पाता
रौशनी का जुगाड़
दिन भर की मज़दूरी कर के किसान,
अँधेरे ही कमा लाता है घर तक
अँधेरे के ही निवाले निगलता
अँधेरे में ही सो जाता है
उसके सपने भी अँधेरे से भरे होते हैं
और उसकी सुबह भी!
उसका सूरज भी!!

2 comments:

अरुण चन्द्र रॉय said...

निखिल को पढ़ते हुए आप तक पहुंचा... किसान के जीवन पर मैंने भी कई कवितायेँ लिखीं हैं लेकिन इतने कम सह्ब्दो में जो प्रभाव आपकी कविता से आया है वह अदभुद है.... आपसे जल्दी मिलने का जुगाड़ करता हू... अरुण

Prem Chand Sahajwala said...

धन्यवाद अरुण जी. मुझे खुशी होगी आप से मिल कर.